काले व लाल रंग के बाद अब छत्तीसगढ़ में हरे चावल की खेती, विदेशों में हो रही मांग

रायपुर| एक वक़्त ऐसा भी था जब छत्तीसगढ़ की पहचान केवल नक्सलवाद तक सीमित रह गयी थी लेकिन आज अपनी अनूठी पम्पराओं,अपने नवाचार, नए नए प्रयोगों और उपलब्धियों के चलते छत्तीसगढ़ न केवल देश बल्कि विदेशों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ रहा है| चाहे बात हो स्ट्राबेरी खेती की,गोबर से बने अकल्पनीय उत्पादों की,बस्तर आर्ट्स की या रंग बिरंगे चावलों की खेती की इन सभी उपलब्धिओं ने विदेशों में भी छत्तीसगढ़ का परचम लहराया है |

बहरहाल हम बात करते हैं हरे चावल यानि ग्रीन राईस (जिन्हे बैम्बू या मुलायारी के नाम से भी जाना जाता है) की खेती के बारे में जो न केवल मानवीय स्वास्थ्य के लिए वरदान है बल्कि स्वाद में भी बासमती को टक्कर दे रहा है इसकी इन्ही खूबियों की वजह से इस चावल की कीमत लगभग 500 से 600 रुपए प्रति किलो है। और अब इसकी डिमांड दुबई तक होने लगी है।

वर्तमान में छत्तीसगढ़ में लाल और काले चावल के बाद अब हरे चावल की खेती को प्राथमिकता दिया जा रहा है । साइज में यह एचएमटी से भी पतला है। खुशबू के मामले में जहां ये जंवाफुल को टक्कर दे रहा है, तो वहीं स्वाद के मामले में बासमती से बेहतर है। खासबात ये है कि कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज कंट्रोल करने के मामले में भी यह लाभदायक है। वर्तमान में फ़िलहाल धमतरी, महासमुंद और रायगढ़ में हरे चावल की खेती की जा रही है। महासमुंद में कौंदकेरा के किसान योगेश्वर चंद्राकर ने हाल ही में इसकी खेती शुरू की है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में इससे पहले काले व् लाल रंग के चावलों की भी खेती की जा रही है| लें कोरोना काल में ग्रीन राइस की बढ़ती मांग को देखते हुए किसानो ने ग्रीन राईस की खेती शुरू कर दी है पतला होने के अलावा स्वाद और खुशबू के मामले में भी यह चावल बाकियों से बेहतर है|

बात करे हरे चावल के फायदों कि तो ग्रीन राइस कस्तूरी प्रजाति का एक चावल है, जिसमें कैंसर रोधक क्षमता पाई जाती है। यह ग्लूटेन रहित चावल है,जो वजन घटाने में भी सक्षम है। चावल में मौजूद क्लोरोफिल होने से कैंसर के खतरे को कम करता है। वो कहते हैं कि कोरोना संक्रमण काल में लाल और हरे चावल में मौजूद औषधीय गुणों की वजह से इसका निर्यात अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर हो रहा है। भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी इलाकों समेत छत्तीसगढ़ में भी बड़े पैमाने पर की जा रही है।

हालाँकि ये चावल आसानी से नहीं मिल पाते, क्योंकि ये मरते हुए बांस के बीज होते हैं। इसे तभी इक्कठा किया जा सकता है, जब बांस का जीवनचक्र पूरा हो गया हो। इसका स्वाद हल्का मीठापन लिए होती है। ये पोटेशियम और प्रोटीन का बेहतर सोर्स है। डायबिटीज के मरीज इसे अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। कोलेस्ट्रोल लेवल घटाने के अलावा ग्रीन राइस डाइजेशन भी सही रखता है।

हरे चावल की प्रजाति पर इंदिरा गांधी कृषि अनुसंधान केंद्र रायपुर में कृषि वैज्ञानिक शोध भी कर रहे हैं। इस चावल के खाने से कई गंभीर बीमारियों से निजात मिल सकती है। कोरोना काल में इसकी खेती किसानों के लिए आर्थिक तौर पर काफी फायदेमंद साबित हो रही है।

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